रेंगता वक्त-भागता वक्त
स्टे्रट ड्राईव बाय सपन दुबे
बैतूल। टाइटन वॉचेस एडं वियरेबल्स (घड़ी निर्माता कंपनी) की सीईओ सुपर्णा मित्रा ने अपने एक नवीनतम साक्षात्कार में बताया कि अब लोग समय देखने के लिए नहीं बल्कि स्टाइल स्टेटमेंट के रूप में घडिय़ां पहनते हैं। याने की घड़ी भी जेवरात में शुमार हो गई हैं। वास्तविकता यह है कि मोबाईल के आने से घड़ी नाम की डिवाईस भी संघर्ष कर रही है। मोबाईल ने घड़ी के साथ वक्त, जिज्ञासाएं, फिटनेस और रिश्ते भी बिना डकार लिए निगल लिए हैं। आज उपहार के रूप में घड़ी दी जा रही है लेकिन वक्त नहीं। टाईम और टाईमिंग की महत्ता हर क्षेत्र में विद्यमान है। फिल्म मेरा नाम जोकर और लम्हें समय से काफी समय पहले रजतपट पर उतारने का खामियाजा उठाना पड़ा। मिस्बाह द्वारा खेले गए गलत टाईमिंग वाले शॉट ने भारत को विश्व विजेता बना दिया था। घड़ी कितनी भी मंहगी हो परन्तु वक्त कभी खरीदा नहीं जा सकता है। महाभारत के सूत्रधार हरिश भिमानी की आवाज मैं समय हूं आज भी कानों में गूंजती है पूरा धारावाहिक का केन्द्रीय पात्र समय था। जो बार-बार समय के बलवान होने की पुष्टी करता है। समय बलवान होता है तो गधा भी पहलवान हो जाता है। एक समय मोहम्मद अजहरउद्दीन की कप्तानी में सौरव गांगूली खेलने के लिए मशक्त करते थे एक समय आया मोहम्मद अजहरउद्दीन का बेटा असुद्दीन कोलकत्ता नाईट राईडर से खेलने की जुगत में सौरव गांगूली के समक्ष प्रस्तुत हुआ। विराट कोहली को एक जूनियर कैटेगिरी प्रतियोगिता में बतौर अतिथि आशीष नेहरा ने मैन आफ द मैच दिया था किसने सोचा था की आशीष नेहरा एक दिन विराट की कप्तानी में खेलेगा। कहावत है कि बुरा समय चल रहा हो तो जमीन पर बिछी चटाई से गिर कर भी चोट लग जाती है। बुरा समय लंबा हो जाए तो बुरे दौर में बदल जाता है। जिस सुपर स्टार अमिताभ बच्चन के पास फिल्मों की लाईन लगी होती थी और वे फिल्मों को रिजेक्ट कर देते थे। एक समय आया की उनके पास काम की कमी होने के कारण उन्होने स्वयं यश चोपड़ा से काम के लिए संपर्क किया था। जिसके बाद यश चोपड़ा ने उन्हें फिल्म मोहब्बतें में काम दिया। वक्त ने अच्छे-अच्छे तीसमारखां को धूल चटाई है। राजनीति में भी ऐसा ही होता रहा है लगातार चुनावों में हारे नेता के दरबार में सन्नाटा पसरा होता है। समय के प्रतिकूल होते ही चम्मचे सबसे पहले नदारद हो जाते हैं जैसे डूबते जहाज से चूहे कूद जाते हैं। नेता अपने प्रभावशाली दिनों की जुगाली करता रहता है परन्तु समय का दर्पण सही समय पर नहीं देख पाने के हर्जाने को अदा तो करता ही है साथ ही अपने ढलान को कभी समझ नहीं पाता है या यों कहें ही उसका दंभ उसे कभी समझने नहीं देता है। 90 के दशक में लगातार एक के बाद एक हिट फिल्में देने वाले गोविंदा चरित्र अभिनेता की भूमिका को स्वीकार्य नहीं कर पा रहें हैं। वे अभी भी स्वयं को हीरो के रूप में ही भूमिका करना चाहते हैं। इस कारण विगत वर्षो में उनकी लीड रोल में आई इक्का-दुक्का फिल्में बुरी तरह फ्लाप रहीं। वसीम अकरम ने वक्त पर एक लाजावाब बात कही थी, जब उनसे सन्यास के विषय में पूछा गया था तो उन्होने कहा कि जब सन्यास लो तब लोगों को पूछना चाहिए की इतनी जल्दी क्यों? अभी और खेल सकते थे। इससे मान-सम्मान बना रहता है। गोया कि सामाजिक सिद्धांत कहता है कि ससुराल में चंद दिन रूकना ही बेहतर होता है। फैसला करना मुश्किल होता है कि ज्यादा व्यस्त रहना परेशानी का सबब है या खाली रहना। कल समय मिलेगा यही हमारा सबसे बड़ा भम्र है। वक्त की सबसे ज्यादा कद्र सौ मीटर का धावक के पास होती है जिसका जीवन एक सैकेंड के सौंवे हिस्से में बदल जाता है। वक्त कुछ इलाकों में रेंग कर गुजरता है जहां जिस्म की बात नहीं हो और दिल तक जाना हो वहां सदिया भी लग जाती है।


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