गालियों के भी जायके होते हैं
स्ट्रेट ड्राईव बाय सपन दुबे
नार्थ कोरियन अब गालियों का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे, अगर वे ऐसा करते पाए जाएंगे तो मौत की सजा दी जा सकती है। किम जोंग सरकार की ओर से यह चेतावनी जारी की गई है। भारत में गालियों को लेकर ऐसी सजा का बिल कभी पास नहीं हो सकता है। गालियों का इतिहास मानवीय सभ्यता जितना पुराना हो सकता है। भारत में कुछ किमी की दूरी पर वेशभूषा, खान-पान और भाषा-बोली के साथ गालियां भी भी बदल जाती हैं। जैसे की लखनउ की तहजीब ऐसी है कि कहा जाता है कि वहां लोग तहजीब को ताबीज बनाकर पहनते हैं। ऐसे में दो लखनवी की लड़ाई में एक ने गुस्से में कहा कि आप खामोश हो जाए अन्यथा आपकी अम्मी की शान में गुस्ताखी हो जाएगी। भारत में गालियां संस्कृति का हिस्सा हैं जो विवाह के समय कई बार प्रतिबिंबित होती हैं। जिसमें अनेक लोकगीतों के माध्यम से महिलाएं समधी-समधन, देवर, जेठ आदि को छेड़ती हैं और इसका बुरा भी नहीं माना जाता है इसे मनोरंजन की दृष्टि से देखा जाता है। विवाह में इवेन्ट मैनेजमेंट ने यह बहुमूल्य विरासत छीन ली है। सब कुछ रेडिमेट का दौर है। फाग के लोक गीत में भी गालियां को शुमार किया जाता रहा है जो कि होली के रंग को ज्यादा रंगीन कर देता है। हांलाकि अब इस विद्या का भी चलन खतम होता जा रहा है। न्यूज़ लांड्री के एक कार्यक्रम के दौरान बताया गया कि संक्षिप्त हिन्दी शब्द सागर द्वारा प्रकाशित नागरिप्रचारिणी सभा वाराणसी द्वारा 20 वर्ष के अथक प्रयास के बाद हिन्दी शब्दकोष की रचना की गई थी। पुस्तक का संपादन बाबू श्याम सुंदर दास ने किया और सहयोगी के रूप में रामचन्द्र शुक्ल, बाल कृष्ण भट्ट, जगमोहन वर्मा जैसे हिन्दी के प्रखांड जानकार थे। इस पुस्तक के मुताबिक चूतिया शब्द अश्लिल नही है। इनके मुताबिक इस शब्द का शाब्दिक अर्थ जड़ बुद्धि, मूर्ख आदि है। दुर्भाग्यवश गालियां महिलाओं को ही लक्ष्य करके गढ़ी गई हैं गोया की इस किले के सिंहासन पर भी पुरूष प्रधानता ही विराजित है। सोशल मीडिया पर गालियों के शार्ट फार्म विकसित हो गए हैं। ओटीटी की फिल्मों में गालियां उनकी यूएसपी है या यू कहें की धन कुटाई की फैक्ट्री में गालियां ही इसका मुख्य रॉ मटेरियल है। जिसमें पंकज त्रिपाठी जैसे प्रतिभावान कलाकार को व्यवसायिक समझौते के अंतर्गत गालियां बकनी पड़ रही हैं। भारतीय सिनेमा में बैंडेट क्वीन पहली फिल्म थी जिसमें गालियां चुभी नहीं, यहां गालियां संतुलित, सार्थक और सामंजस्य पूर्ण लगी। कुछ लोगों के वाक्यों में शब्द कम और गालियां ज्यादा होती है। यह इस बात का द्योतक है कि उनके पास अच्छे शब्द नहीं है, और हैं भी तो उनके चयन की शक्ति नहीं है। प्रेम भी ऐसे ही घातक रस है जिससे हो जाए उसकी गालियां भी रसीली लगती है। बनारस की गालियां सिद्ध करती है कि गाली रचने के लिए के भी बहुत रचनात्मकता चाहिए होती है। गालियों को केन्द्र में रखकर मुहावरे भी प्रचलित हैं। वैसे गाली शब्द नहीं नीयत में होती है गाली का एक वर्ग चरित्र होता है जो की क्रोध, अपमान और कभी-कभी प्रेम की अभिव्यक्ति भी होती हैं। गाली किसी लंबे उबाऊ वार्तालाप को एक झटके में खत्म करने का शार्टकट है या अपने मन की भड़ास निकालने का मुक्त किंतु गारण्टी शुदा इलाज हैं। वैसे गाली की अपनी एक अलग तासीर होती है और इसका अपना एक अलग जायका, तो जनाब परोसने से पहले चख जरूर लेना..........


