गुरुवार, 18 नवंबर 2010

                           सत्ता की संवेदनहीन मेडीकल रिर्पोट
                              स्टे्रट ड्राइव बाय सपन दुबे
फिल्म पीपली लाइव एक सवाल की 'भारत क्या अब भी आजाद है 'से शुरू होती है। फिल्म सत्ता और मिडीया की संवेदनहीन मेडीकल रिर्पोट है। जिसमें इनका बाकायदा एक्स रे और एमआरआइ किया गया है। फिल्म को कामयाबी आमीर खान के मीडास टच (मीडास के विषय में किवदंती है कि वो जिसको छू लेता था वह वस्तू सोने की हो जाती थी)के कारण मिली है। अन्यथा इस तरह की फिल्में समय समय पर आती रही है पर दर्शको का ध्यान इन पर नही जाता है। श्याम बेनेगल की वेलडन अब्बा लगभग इसी विषय पर बनी एक उत्कष्र्ठ फिल्म थी। निर्देशक अनुषा रिजवी ने इस फिल्म की सफलता के लिए सबसे पुख्ता इंतजाम हबीब तनवीर के थिएटर के कलाकारों को कास्टिंग करके किया। इंडियन ओशन ग्रुप से ये जो देश है मेरा गवाया गया है। लीक से हट कर किये गये चयन बताते है की फिल्म कितनी तैयारी से बनाई गयी है। इस फिल्म  की स्क्रिप्ट में संकेत के माध्यम से कई बातें कही गई है जैसे दो सेकेंड के दृश्य में कठपुतली का नृत्य दिखया गया है,गरीब मजदूर होरी की मृत्यु को छोड़कर मीडीया टीआरपी के लिये जिंदा नत्था के कवरेज को देता है। राज्य सरकार और केन्द्र सरकार के बीच पिस कर कैसे योजनायें दम तोड देती है। फकत मंहगाई सरकार की एक मात्र योजना है जो हर गरीब तक पहुचती है। भ्रष्टाचार की चक्की से राजनेता जनता को बेहद महीन पीस रहे है। जापान एक मात्र ऐसा देश है जहां पर पोॅलिटीकल कार्टूनीस्ट नहीं है। कारण यह है कि वहां पर भ्रष्टाचार नहीं है। भ्रष्टाचार कार्टूनीस्ट की खुराक होता है। भारत में मंहगाई के लिए  भ्रष्टाचार सबसे बड़ी वजह रहा है। इसी वजह से भारत में पोॅलिटीकल कार्टूनीस्ट की भरमार रही है। इस फिल्म के एक दृश्य में नत्था को गांव का एक बुजूर्ग समझाइस देता है की यहां जी ते जी तो सरकार कुछ देती नही है भला मरने पर किसान को क्या देगी? इस फिल्म को कुछ कलम घसयारे आर्ट फिल्म समझने की भूल कर रहें है। फिल्म  या तो अच्छी होती है या बुरी, आर्ट या व्यवसायिक नहीं होती है। पीपली लाइव के संवाद बेहद सैधांतिक है। एक दृश्य में गांव का एक आदमी न्यूज चैनल को बाइट देता है कि नत्था के कारण हमारे गांव में मेला लगा है और चार पैसे की आमदनी हो रही है। फिल्म में कहीं कहीं गाङ्क्षलयों का इस्तमाल हुआ है। जो वाजिब और तर्क संगत लगता है। किसान के बाप दादाओं की जमीन जब कुर्क होती है तब वह प्रोफेसरों की तरह बात नहीं कर सकता है। वैसे भी गालियां भारत में आम लोगों मेंं जोश को संचार करने का नायब तरीका है। भारतीय गालियों के माध्यम से अपने गुस्से को बहार फेंक देतें है। बिगड़ी हुई सरकारी व्यवस्था के कारण गालियां स्वभाविक लगने लगी है। इस फिल्म के बाद हो सकता है मंहगाई और किसान की आत्महत्या  जैसे मुद्दो को चुनावों में शामिल किया जाये, और उन पर संजीदगी से विचार हो। यह फिल्म पूरे तंत्र को नींद से उठाकर झकोरने का काम करती है।
      

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